DRAG

Shiv Ji Bhajan Lyrics in Hindi | शिव जी भजन lyrics

  • Home
  • Bhajan
  • Shiv Ji Bhajan Lyrics in Hindi | शिव जी भजन lyrics
Shiv Ji Bhajan Lyrics in Hindi

Shiv Ji Bhajan Lyrics · देवनागरी + अर्थ सहित

शिव जी भजन लिरिक्स

Shiv Ji Bhajan Lyrics in Hindi — with transliteration & meaning

संक्षिप्त उत्तर

यह पेज शिव जी के सबसे लोकप्रिय और परंपरागत भजनों का संग्रह है — ॐ जय शिव ओंकारा आरती, शिव चालीसा, रुद्राष्टकम्, महामृत्युंजय मंत्र, शिव तांडव स्तोत्रम् और कर्पूर गौरं। हर भजन देवनागरी में पूरा लिखा है, साथ रोमन लिप्यंतरण और सरल अर्थ भी दिया गया है — घर की पूजा में, सावन में, या केदारनाथ यात्रा के दौरान गाने के लिए।

शिव जी के भजन उतने ही पुराने हैं जितनी उनकी भक्ति परंपरा। कुछ भजन वेदों से आए हैं, कुछ भक्ति काल के संतों की रचना हैं, और कुछ लोक-कंठ से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते आए हैं — बिना किसी एक लिखित स्रोत के। इस पेज पर दिए गए सभी भजन और स्तोत्र पारंपरिक हैं, किसी आधुनिक गायक या संगीतकार की रचना नहीं, इसलिए इन्हें यहाँ पूरा लिखा गया है।

अगर आप केदारनाथ या किसी अन्य शिव धाम की यात्रा की तैयारी कर रहे हैं, तो ये भजन आपके सफर के साथी बन सकते हैं — गौरीकुंड से केदारनाथ के पैदल मार्ग पर, दर्शन की कतार में, या यात्रा से पहले घर की पूजा में।

इस पेज में शामिल भजन

ॐ जय शिव ओंकारा

Om Jai Shiv Omkara — पूरी आरती

दैनिक आरती

शिव जी की सबसे व्यापक रूप से गाई जाने वाली आरती — लगभग हर घर, हर मंदिर की सुबह-शाम पूजा में शामिल। इसकी रचना पारंपरिक रूप से शिवानंद स्वामी से जुड़ी मानी जाती है, हालांकि मूल श्रेय मौखिक परंपरा में स्पष्ट नहीं है।

पूरे बोल — देवनागरी

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोलानाथ की करत सेवकारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी की आरति जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

Transliteration

Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara,
Brahma Vishnu Sadashiva, Ardhangi Dhara.
Om Jai Shiv Omkara.

Ekanan Chaturanan Panchanan Raje,
Hansasan Garudasan Vrishvahan Saje.
Om Jai Shiv Omkara.

(शेष पंक्तियाँ इसी लय में गाई जाती हैं)

अर्थ

यह आरती शिव के ओंकार-स्वरूप की स्तुति करती है — कि वे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों रूपों में व्याप्त हैं, उनका आधा अंग पार्वती है, और वे अलग-अलग मुखों व वाहनों में विराजते हैं। अंतिम पंक्ति में कहा गया है कि जो श्रद्धा से यह आरती गाता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है — यह पारंपरिक भक्ति-विश्वास है।

कब गाई जाती है

सुबह और शाम की पूजा में, घंटी और शंख के साथ। सावन और महाशिवरात्रि पर विशेष महत्व।

शिव चालीसा

Shiv Chalisa — पूरा पाठ

40 चौपाई

चालीस चौपाइयों और दो दोहों में रचित यह स्तुति रामचरितमानस शैली की भाषा में शिव जी के रूप और लीलाओं का वर्णन करती है। परंपरागत रूप से "अयोध्यादास" नाम इससे जुड़ा मिलता है, पर निश्चित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। ध्यान दें: मौखिक परंपरा के कारण अलग-अलग छपी प्रतियों में कुछ पंक्तियों में मामूली अंतर मिल सकता है — यहाँ सबसे प्रचलित रूप दिया गया है।

दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

चौपाई — पूरा पाठ

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाए। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नंदी गणेश सोहैं तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहिं दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ। लव निमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकंठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनंत अविनासी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावें। भ्रमत रहूँ मोहि चैन न आवे॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

मात-पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावें। शारद नारद शीश नवावें॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। तापर होत है शंभु सहाई॥

ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन इच्छा कर कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पंडित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा। तन नहिं ताके रहे कलेशा॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

कहे अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

दोहा — समापन

नित नेम कर प्रातः ही, पाठ करौ चालीस।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

भावार्थ — सारांश में

शिव चालीसा में क्रमशः शिव जी के रूप-सौंदर्य, पार्वती से विवाह, तारकासुर व त्रिपुरासुर वध, समुद्र-मंथन में विषपान और नीलकंठ नाम, भागीरथ की तपस्या में सहायता, और भक्तों के संकट हरने की लीलाओं का वर्णन है। अंत की पंक्तियाँ भक्त की व्यक्तिगत प्रार्थना हैं — जीवन के कष्ट, ऋण और पापों से मुक्ति के लिए।

कब पढ़ें

प्रतिदिन प्रातः, विशेष रूप से त्रयोदशी तिथि और सोमवार को।

रुद्राष्टकम्

Rudrashtakam — तुलसीदास रचित

9 श्लोक · संस्कृत

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित नौ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र, रामचरितमानस की परंपरा से जुड़ा हुआ। यह शिव जी के निर्गुण-सगुण दोनों स्वरूपों की स्तुति करता है, अपेक्षाकृत सरल संस्कृत में।

पूरे श्लोक — संस्कृत

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥१॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम्॥२॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥३॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥४॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्र्यःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥५॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजंतीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥७॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥८॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥९॥

Transliteration — प्रथम दो श्लोक

Namamishamishan nirvanroopam vibhum vyapakam brahmavedswaroopam,
Nijam nirgunam nirvikalpam niriham chidakashamakashvasam bhaje'ham.

Nirakaramonkarmoolam turiyam girajnanagoteetmisham girisham,
Karalam mahakalkalam kripalam gunagarsansarparam nato'ham.

अर्थ

आरंभ शिव के निराकार, निर्गुण और मुक्तिस्वरूप की वंदना से होता है — वे आकाश के समान व्यापक हैं। आगे उनके सगुण रूप का वर्णन है: हिमालय-सा गौर वर्ण, मस्तक पर गंगा और चंद्रमा, गले में सर्प। छठे-सातवें श्लोक में भक्त स्वयं की असमर्थता स्वीकार कर क्षमा-याचना करता है, और अंतिम श्लोक कहता है कि जो श्रद्धा से पाठ करता है, शिव उस पर प्रसन्न होते हैं।

कब पढ़ें

शिवरात्रि, सावन सोमवार, और रुद्राभिषेक के समय — प्रायः मंदिरों में सामूहिक रूप से भी गाया जाता है।

महामृत्युंजय मंत्र

Mahamrityunjaya Mantra

वैदिक मंत्र

ऋग्वेद से लिया गया एक अत्यंत प्राचीन वैदिक मंत्र, जिसे "त्र्यंबकम मंत्र" भी कहा जाता है — शिव के मृत्युंजय स्वरूप को समर्पित।

मंत्र — संस्कृत

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

Transliteration

Om Tryambakam Yajamahe Sugandhim Pushtivardhanam,
Urvarukamiva Bandhanan Mrityor Mukshiya Ma'mritat.

अर्थ

"हम त्रिनेत्रधारी शिव की उपासना करते हैं, जो सुगंधित हैं और सबका पोषण करते हैं। जैसे पका हुआ खीरा अपनी बेल के बंधन से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, अमरता से नहीं बल्कि मोक्ष से जोड़ें।" यह मंत्र जीवन के संकटों में शांति की कामना के लिए जपा जाता है — पारंपरिक विश्वास के अनुसार, न कि किसी चमत्कारिक इलाज के दावे के रूप में।

कैसे जपें

साधारणतः 108 बार, रुद्राक्ष माला के साथ, शांत स्वर में। सावन सोमवार और महाशिवरात्रि पर विशेष माना जाता है।

शिव तांडव स्तोत्रम्

Shiv Tandav Stotram — आरंभिक श्लोक

17 श्लोक में से चयन

परंपरागत रूप से रावण द्वारा रचित माना जाता है। यह अत्यंत लयबद्ध और ओजस्वी छंद में है, इसलिए पाठ या गायन कठिन माना जाता है। नीचे इसके प्रसिद्ध आरंभिक श्लोक दिए गए हैं; पूरा स्तोत्र सत्रह श्लोकों का है।

आरंभिक श्लोक — संस्कृत

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥

अर्थ — सारांश में

पहले श्लोक में शिव की जटाओं से बहती गंगा, गले में लिपटे सर्पों की माला, और डमरू की गूँज के साथ प्रचंड तांडव नृत्य का वर्णन है। दूसरे श्लोक में जटाओं में समाई गंगा की लहरों और ललाट पर जलती अग्नि का चित्रण है। तीसरे में भक्त पार्वती सहित शिव के दिव्य रूप में मन के रम जाने की कामना करता है।

कब गाया जाता है

महाशिवरात्रि के रात्रि-जागरण में, और शास्त्रीय नृत्य की तांडव प्रस्तुतियों में।

कर्पूर गौरं

Karpur Gauram — संक्षिप्त शिव स्तुति

1 श्लोक

श्लोक — संस्कृत

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

Transliteration

Karpoor Gauram Karunavataram Sansara Saram Bhujagendra Haram,
Sada Vasantam Hridayaravinde Bhavam Bhavani Sahitam Namami.

अर्थ

"जो कर्पूर के समान श्वेत हैं, करुणा के साक्षात अवतार हैं, संसार के सार हैं, जिनके गले में सर्पों की माला है — ऐसे भव को, जो सदा हृदय-कमल में निवास करते हैं और पार्वती सहित विराजते हैं, मैं नमन करता हूँ।" यह छोटा श्लोक अक्सर आरती के अंत में या शिव पूजा के समापन पर बोला जाता है।

केदारनाथ और शिव भक्तों के लिए

महत्वSignificance for Kedarnath & Shiva devotees

केदारनाथ धाम पंच केदारों में सबसे प्रमुख माना जाता है, और यहाँ की यात्रा शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों रूप से चुनौतीपूर्ण होती है। कई यात्री गौरीकुंड से केदारनाथ के 16-17 किमी पैदल मार्ग पर चलते हुए ॐ जय शिव ओंकारा या महामृत्युंजय मंत्र का मन ही मन जाप करते हैं — इससे चलने की थकान में भी एक लय और सहारा मिलता है। दर्शन की लंबी कतार में भी शिव चालीसा का पाठ आम दृश्य है।

सरल सुझाव

भजन गाने/पढ़ने के लिएTips for singing & reciting

  • शुरुआत में धीमी गति से पढ़ें, संस्कृत के संयुक्ताक्षरों (जैसे त्र्यम्बकं, चिदाकाशम्) पर उच्चारण स्पष्ट रखें।
  • शिव चालीसा जैसे लंबे पाठ को छोटे भागों में याद करें — एक बार में 8-10 पंक्तियाँ पर्याप्त हैं।
  • समूह में गाते समय एक व्यक्ति पंक्ति बोले और बाकी दोहराएं — भजन-मंडलियों की पारंपरिक शैली।
  • मंत्र-जाप में गिनती रखने के लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग करें।
  • अर्थ समझकर पढ़ने से भावनात्मक जुड़ाव गहरा होता है — ऊपर दिए अर्थ को एक बार जरूर पढ़ें।
अवसर अनुसार

कब गाए जाते हैं ये भजनBy occasion

सावन सोमवार

महामृत्युंजय मंत्र, ॐ जय शिव ओंकारा, रुद्राष्टकम्

महाशिवरात्रि

शिव तांडव स्तोत्रम्, शिव चालीसा, रात्रि-जागरण भजन

केदारनाथ कपाट खुलने पर

वैदिक मंत्रों के साथ महामृत्युंजय और आरती का पाठ

दैनिक पूजा

ॐ जय शिव ओंकारा आरती, कर्पूर गौरं

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न-उत्तरFAQs

शिव जी भजन लिरिक्स हिंदी में कहाँ मिलेंगे?

इस पेज पर शिव जी के छह प्रमुख भजन/स्तोत्र देवनागरी हिंदी में पूरे दिए गए हैं, साथ में अर्थ और उच्चारण सहायता भी है।

शिव जी का सबसे लोकप्रिय भजन कौन सा है?

"ॐ जय शिव ओंकारा" आरती सबसे व्यापक रूप से गाई जाने वाली रचना है, क्योंकि यह लगभग हर घर की दैनिक पूजा में शामिल है।

शिव चालीसा रोज पढ़ी जा सकती है क्या?

हाँ, परंपरा में शिव चालीसा का प्रतिदिन प्रातः पाठ करने की सलाह दी जाती है, विशेषकर सोमवार और त्रयोदशी तिथि पर।

ॐ जय शिव ओंकारा आरती कब गाई जाती है?

यह आरती सुबह और शाम दोनों समय की पूजा में गाई जाती है, और सावन व शिवरात्रि पर इसका महत्व और बढ़ जाता है।

रुद्राष्टकम् किसने लिखा?

रुद्राष्टकम् की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी, जो रामचरितमानस के रचयिता भी हैं।

महामृत्युंजय मंत्र का जाप कैसे करना चाहिए?

इसे शांत मन से, स्पष्ट उच्चारण के साथ, परंपरागत रूप से 108 बार रुद्राक्ष माला पर जपा जाता है — सुबह या सावन सोमवार को विशेष रूप से।

शिव तांडव स्तोत्रम् किसने रचा था?

यह स्तोत्र परंपरागत रूप से रावण द्वारा शिव की स्तुति में रचा गया माना जाता है।

भजन गाने के लिए संस्कृत जानना जरूरी है?

नहीं। ट्रांसलिटरेशन और अर्थ की मदद से कोई भी भक्त बिना संस्कृत जाने भी शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ कर सकता है।

केदारनाथ यात्रा के दौरान कौन से भजन गाए जाते हैं?

यात्री अक्सर ॐ जय शिव ओंकारा, महामृत्युंजय मंत्र और शिव चालीसा का जाप पैदल मार्ग और दर्शन कतार में करते हैं।

क्या इन भजनों के अलग-अलग संस्करण हो सकते हैं?

हाँ, विशेषकर मौखिक परंपरा से चली आई रचनाओं में क्षेत्र के अनुसार शब्दों में मामूली अंतर मिल सकता है — यहाँ सबसे प्रचलित रूप दिया गया है।

शिव जी के ये भजन सदियों से भक्तों के साथ चलते आए हैं — कभी घर की पूजा में, कभी किसी दुर्गम पर्वतीय मार्ग पर। चाहे आप इन्हें रोज पढ़ें या केदारनाथ यात्रा की तैयारी में साथ रखें, इनका शुद्ध पाठ और सही अर्थ जानना ही इस भक्ति को गहरा बनाता है।

केदारनाथ यात्रा योजना देखें
KEDARNATH TOURISM · BHAJAN & DEVOTIONAL CONTENT

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *