ॐ जय शिव ओंकारा
Om Jai Shiv Omkara — पूरी आरती
शिव जी की सबसे व्यापक रूप से गाई जाने वाली आरती — लगभग हर घर, हर मंदिर की सुबह-शाम पूजा में शामिल। इसकी रचना पारंपरिक रूप से शिवानंद स्वामी से जुड़ी मानी जाती है, हालांकि मूल श्रेय मौखिक परंपरा में स्पष्ट नहीं है।
पूरे बोल — देवनागरी
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता।
जगकर्ता जगभर्ता जगपालनकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठि भोलानाथ की करत सेवकारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी की आरति जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
Transliteration
Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara,
Brahma Vishnu Sadashiva, Ardhangi Dhara.
Om Jai Shiv Omkara.
Ekanan Chaturanan Panchanan Raje,
Hansasan Garudasan Vrishvahan Saje.
Om Jai Shiv Omkara.
(शेष पंक्तियाँ इसी लय में गाई जाती हैं)
अर्थ
यह आरती शिव के ओंकार-स्वरूप की स्तुति करती है — कि वे ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों रूपों में व्याप्त हैं, उनका आधा अंग पार्वती है, और वे अलग-अलग मुखों व वाहनों में विराजते हैं। अंतिम पंक्ति में कहा गया है कि जो श्रद्धा से यह आरती गाता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है — यह पारंपरिक भक्ति-विश्वास है।
कब गाई जाती है
सुबह और शाम की पूजा में, घंटी और शंख के साथ। सावन और महाशिवरात्रि पर विशेष महत्व।

